वृद्धाश्रम में रखा रहा पिता का शव, बच्चे नहीं पहुंचे:मैनेजमेंट ने बुलाया तो कहा- आप अंतिम संस्कार कर दो, डेथ सर्टिफिकेट भिजवा देना
AdminAugust 10, 2026
एक पिता ने जिंदगीभर मेहनत कर अपने चार बच्चों को पाला। जो कुछ कमाया, उनके बीच बांट दिया। जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर उसी पिता को अपनों से दूर वृद्धाश्रम में रहना पड़ा। मौत के बाद बच्चे उनका चेहरा देखने तक नहीं पहुंचे। भोपाल में 'अपना घर' वृद्धाश्रम का प्रबंधन 70 वर्षीय घनश्याम की मौत के बाद दो दिन तक उनके परिजन के आने का इंतजार करता रहा। बेटियों ने आने से इनकार कर दिया, बेटों ने भी पहुंचने में असमर्थता जताई। परिवार की ओर से बार-बार आश्रम प्रबंधन से ही अंतिम संस्कार करने और डेथ सर्टिफिकेट उपलब्ध कराने को कहा जाता रहा। आश्रम संचालिका माधुरी मिश्रा के मुताबिक, बुजुर्ग की मौत 4 अगस्त 2026 को हुई थी। परिवार से संपर्क की कोशिशें की गईं, लेकिन कोई अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंचा। शव को दो दिन तक इस उम्मीद में रखा गया कि शायद कोई अपना आएगा। बाद में पुलिस की मदद से अंतिम संस्कार कराया गया। बेटे-बेटी ने कहा- उन्होंने हमारे लिए कुछ नहीं किया माधुरी मिश्रा ने बताया कि बुजुर्गों की मौत के बाद परिवार के नहीं पहुंचने की स्थिति में आश्रम के सामने सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि शव को सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है। घनश्याम की मौत के बाद प्रबंधन ने उनकी बेटी से संपर्क किया। उसने कहा कि पिता ने अपनी संपत्ति बेटों को दे दी थी। उसे पिता की संपत्ति में कुछ नहीं मिला, इसलिए वह अंतिम संस्कार के लिए क्यों आए? वहीं, बेटों ने कहा, 'उन्होंने हमारे लिए किया ही क्या है।' टायर-ट्यूब का कारोबार कर 4 बच्चों को पाला था माधुरी बताती हैं कि आश्रम में प्रवेश के समय बुजुर्गों से परिवार और संपर्क की पूरी जानकारी ली जाती है। घनश्याम इंदौर के रहने वाले थे। परिवार वहीं रहता है। वे साइकिल के टायर-ट्यूब का थोक कारोबार करते थे। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। उनसे संपर्क किया तो वे दो दिन तक आने को लेकर तरह-तरह के बहाने बनाते रहे। कभी ट्रेन का टिकट नहीं होने की बात कही तो कभी बस में जगह नहीं होने की। इस बीच आश्रम शव को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद करता रहा। बाद में जब परिवार की ओर से डेथ सर्टिफिकेट की मांग की गई तो माधुरी ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार में परिवार शामिल नहीं हुआ, उसके मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी आश्रम पर दबाव नहीं बनाया जा सकता। आधार कार्ड और दूसरे दस्तावेज नहीं होते माधुरी मिश्रा पिछले करीब 30 साल से बुजुर्गों की सेवा कर रही हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि बुजुर्गों को उनके बच्चे आश्रम में छोड़ जाते हैं और फिर उनका हाल तक जानने नहीं आते। 80 साल के घनश्याम को परिवार का कोई सदस्य भोपाल लाकर छोड़ गया था। वे कई दिन तक भटकते रहे। फिर रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर भीख मांगकर गुजारा करते रहे। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के माध्यम से उन्हें आश्रम लाया गया। वे करीब चार साल तक यहीं रहे। माधुरी के मुताबिक, कई बुजुर्गों को अपने बच्चों का सही पता तक नहीं मालूम होता। बच्चे माता-पिता के आधार कार्ड और दूसरे दस्तावेज भी अपने पास रख लेते हैं। जिससे उनके परिवार तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। माता-पिता को जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर रहे माधुरी का कहना है कि समाज में बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता कम होती जा रही है। कुछ परिवारों में माता-पिता को उनकी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया जाता है। वे कहती हैं, ‘माता-पिता ने जिंदगीभर बच्चों के लिए मेहनत की, लेकिन आज कई बच्चे उनसे पूछते हैं कि आपने हमारे लिए किया क्या?’ उन्होंने बताया कि इससे पहले भी आश्रम में ऐसे कई मामले आए हैं। एक बुजुर्ग महिला की बेटियों ने उनके साथ मारपीट की। उनके गहने छीन लिए। बाद में वह महिला आश्रम में रही। खबर पर आप अपनी राय यहां दे सकते हैं… ये खबर भी पढ़ें… बेटों ने छोड़ा, बहुओं ने ठुकराया मां…सिर्फ एक शब्द नहीं, पूरा संसार है। मां जीवन का आधार है, लेकिन वक्त का सबसे दर्दनाक सच यह है कि जिस मां ने बच्चों को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वही मां उम्र के आखिरी पड़ाव पर सहारे की मोहताज है। बेटों ने घर से निकाल दिया, बहुओं ने साथ छोड़ दिया। फिर भी इन माताओं की जुबान पर शिकायत नहीं, सिर्फ बच्चों के लिए दुआ है। पढ़ें पूरी खबर…
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