
रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड ने शुक्रवार को वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी का कंसॉलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 22.40% घटकर 20,946 करोड़ रुपए रहा। एक साल पहले की समान तिमाही में मुनाफा ₹26,994 करोड़ था। हालांकि, तिमाही आधार पर कंपनी का मुनाफा 23% बढ़ा है। पिछली तिमाही यानी वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में कंपनी को 16,971 करोड़ रुपए का मुनाफा हुआ था। कंपनी का रेवेन्यू 25% बढ़कर 3.11 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया। एक साल पहले की समान तिमाही यानी अप्रैल-जून 2026 में यह 2.48 लाख करोड़ रुपए रहा था। वहीं तिमाही आधार पर कंपनी का रेवेन्यू 4% घटा है। पिछली तिमाही में रेवेन्यू 3.25 लाख करोड़ रुपए था। कंपनी के पांच मेन सेगमेंट हैं- रिलायंस जियो (जियो प्लेटफॉर्म), रिटेल, डिजिटल, ऑयल टू केमिकल्स (O2C) और ऑयल एंड गैस। यहां हम एक-एक कर सभी का पहली तिमाही का परफॉर्मेंस बता रहे हैं... रिलायंस जियो सालाना आधार पर (कंसॉलिडेटेड) जियो का मुनाफा बढ़ा है, लेकिन 5G एसेट्स के कैपिटलाइजेशन के कारण कंपनी का ब्याज खर्च और डेप्रिसिएशन चार्ज भी बढ़ा है, जिसने मुनाफे की रफ्तार को थोड़ा सीमित किया। ऑयल टू केमिकल से लेकर अदर बिजनेस सालाना आधार पर (कंसॉलिडेटेड) रिलायंस रिटेल का रजिस्टर्ड कस्टमर बेस 10.6% की ग्रोथ के साथ 39 करोड़ हो गया है। इस तिमाही में 577 नए स्टोर्स खुलने के साथ ही कुल स्टोर्स की संख्या अब 20,169 हो गई है। रिलायंस के नतीजों में आम आदमी के लिए क्या है? 1. जियो यूजर्स के लिए: 5G नेटवर्क और तेज होगा, नहीं रुकेंगे वीडियो अगर आप जियो यूजर हैं, तो आपके लिए अच्छी खबर है। कंपनी ने 5G नेटवर्क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश जारी रखा है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में आपको 5G की स्पीड और बेहतर मिलेगी, कॉल ड्रॉप की समस्या कम होगी और वीडियो स्ट्रीमिंग बिना किसी रुकावट के होगी। जियो के साथ करोड़ों नए ग्राहक जुड़ रहे हैं। जब नेटवर्क बड़ा होता है, तो कंपनी कनेक्टिविटी और ग्रामीण इलाकों में सर्विस सुधारने पर ज्यादा ध्यान देती है। 2. जियो एयरफाइबर और ब्रॉडबैंड: घर-घर पहुंचेगा हाई-स्पीड इंटरनेट कंपनी अपने जियो फाइबर (वायरलेस होम इंटरनेट) और फिक्स ब्रॉडबैंड का दायरा बहुत तेजी से बढ़ा रही है। अगर आप ऐसे इलाके में रहते हैं जहां केबल वाला इंटरनेट नहीं पहुंच पाता, तो अब आपको एयरफाइबर के जरिए आसानी से हाई-स्पीड इंटरनेट मिल सकेगा। यह बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई और वर्क फ्रॉम होम करने वालों के लिए मददगार साबित होगा। 3. रिलायंस रिटेल: नए स्टोर्स खुलेंगी, शॉपिंग होगी और आसान रिलायंस अपने रिटेल नेटवर्क और स्टोर के इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार बड़ा कर रहा है। इसका मतलब है कि आपके नजदीकी शहरों या इलाकों में रिलायंस के नए स्टोर्स (जैसे रिलायंस फ्रेश, स्मार्ट, डिजिटल या ट्रेंड्स) खुल सकते हैं, जिससे आपको खरीदारी के लिए ज्यादा ऑप्शन मिलेंगे। कंपनी अपने एफएमसीजी यानी रोजमर्रा के इस्तेमाल होने वाले घरेलू सामानों के खुद के ब्रांड्स का पोर्टफोलियो बढ़ा रही है। बाजार में रिलायंस के नए और किफायती प्रोडक्ट्स आने से आम आदमी को महंगाई के दौर में सस्ते ऑप्शन मिल सकते हैं। 4. न्यू एनर्जी: आने वाले समय में मिल सकती है सस्ती बिजली रिलायंस अपने 'न्यू एनर्जी' प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम कर रहा है और भारी निवेश कर रहा है। कंपनी बड़े पैमाने पर सोलर पैनल, ग्रीन हाइड्रोजन और गीगा-फैक्ट्रीज लगा रही है। भविष्य में जब यह प्रोजेक्ट पूरी तरह चालू होंगे, तो देश में क्लीन एनर्जी का प्रोडक्शन बढ़ेगा, जिससे पर्यावरण तो सुधरेगा ही, साथ ही आम आदमी को भी सस्ती बिजली और ईंधन का फायदा मिल सकता है। 5. पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस (O2C बिजनेस): देश में फ्यूल की सप्लाई रहेगी मजबूत रिलायंस के ऑयल-टू-केमिकल्स (O2C) यानी रिफाइनरी बिजनेस का प्रदर्शन मजबूत रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के दाम के उतार-चढ़ाव के बावजूद रिलायंस की रिफाइनरियां लगातार पूरी क्षमता से काम कर रही हैं। इससे देश के भीतर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी (LPG) जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई में कोई कमी नहीं आएगी और कीमतें भी कंट्रोल में रहने की उम्मीद है। 6. रोजगार के अवसर: युवाओं के लिए नौकरियों के मौके रिलायंस अपने हर बड़े सेक्टर (रिफाइनरी, रिटेल, जियो और न्यू एनर्जी) में लगातार विस्तार और नए प्रोजेक्ट्स पर निवेश बढ़ा रहा है। जब भी कोई कंपनी इतने बड़े स्तर पर नेटवर्क और नए प्लांट लगाती है, तो लॉजिस्टिक्स, डिलीवरी, स्टोर्स, टेक्निकल सपोर्ट और कंस्ट्रक्शन जैसे फील्ड में लाखों नए डायरेक्ट और इनडायरेक्ट रोजगार पैदा होते हैं। 7. शेयर बाजार के निवेशकों के लिए: लॉन्ग टर्म में मजबूती के संकेत यदि आपने रिलायंस के शेयर खरीदे हैं या किसी ऐसे म्यूचुअल फंड में निवेश किया है जिसमें रिलायंस का शेयर शामिल है, तो कंपनी के कुल टर्नओवर और मुनाफे में निरंतरता आपके निवेश को सुरक्षा देती है। हालांकि छोटी अवधि में बाजार के उतार-चढ़ाव दिख सकते हैं, लेकिन कंपनी का मजबूत ढांचा लंबे समय में आपके पैसों को बढ़ाने में मदद करता है। इस साल अब तक 10% गिरा रिलायंस का शेयर शुक्रवार को FY27 की पहली तिमाही के नतीजों से पहले रिलायंस का शेयर 2.48% बढ़कर 1,328 रुपए पर बंद हुआ। बीते 5 दिन में कंपनी का शेयर 2% चढ़ा है। इस साल यानी 1 जनवरी से अब तक शेयर 15% गिरा है। वहीं एक साल में 10% गिरा है। रिलायंस का मार्केट कैप 17.95 लाख करोड़ रुपए है। भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट सेक्टर कंपनी है रिलायंस रिलायंस भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट सेक्टर कंपनी है। ये अभी हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन और प्रोडक्शन, पेट्रोलियम रिफाइनिंग और मार्केटिंग, पेट्रोकेमिकल्स, एडवांस मटेरियल और कंपोजिट, रिन्यूएबल एनर्जी, डिजिटल सर्विस और रिटेल सेक्टर में काम करती है। ये खबर भी पढ़ें… देश में जल्द चलेंगे प्लास्टिक-नोट, RBI ने जारी किया टेंडर: ₹10 और ₹20 के नोटों से शुरू होगा ट्रायल, 2027 में फुल-स्केल लॉन्च की उम्मीद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया जल्द ही देश में प्लास्टिक यानी पॉलीमर से बने नोटों का पहला पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह देश में नए जनरेशन की करेंसी लाने की RBI के प्लान का अगला कदम है। पूरी खबर पढ़ें…

पाकिस्तान ने अपने अवैध कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान को देश का पांचवां राज्य (प्रांत) बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। गुरुवार को गिलगित-बाल्टिस्तान विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से संविधान में संशोधन करके इस क्षेत्र को राज्य का दर्जा देने की मांग की। प्रस्ताव में कहा गया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को पाकिस्तान के दूसरे राज्यों के नागरिकों की तरह समान संवैधानिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक अधिकार दिए जाएं। इसके साथ ही इस क्षेत्र को नेशनल असेंबली, सीनेट और अन्य संघीय संवैधानिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व देने की भी मांग की गई है। प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, नेता विपक्ष और दो निर्दलीय विधायकों के हस्ताक्षर हैं। अब इसे आगे की मंजूरी के लिए पाकिस्तान की संसद भेजा जाएगा। प्रस्ताव में क्या-क्या है? फिलहाल पाकिस्तान में चार ही राज्य हैं- पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा। गिलगित-बाल्टिस्तान अब तक सीमित स्वशासन के तहत संचालित होता रहा है और उसे पाकिस्तान के अन्य राज्यों जैसा संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है। प्रस्ताव में कहा गया है कि गिलगित-बाल्टिस्तान को अभी स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी (प्रोविजनल) तौर पर राज्य बनाया जाएगा। अगर भविष्य में जम्मू-कश्मीर विवाद का कोई समाधान निकलता है, तो उसके अनुसार इस क्षेत्र की स्थिति दोबारा तय की जा सकेगी। इसके साथ ही प्रस्ताव में यह भी मांग की गई है कि जब तक गिलगित-बाल्टिस्तान को राज्य का दर्जा नहीं मिलता, तब तक पाकिस्तान की केंद्र सरकार और चारों राज्य यह सुनिश्चित करें कि इस क्षेत्र को भी सरकारी फंड और राष्ट्रीय संसाधनों में उचित हिस्सा मिले। यानी गिलगित-बाल्टिस्तान को भी दूसरे राज्यों की तरह विकास के लिए धन दिया जाए। गिलगित-बाल्टिस्तान का राज्य बनना कितना मुश्किल? पाकिस्तान लंबे समय से कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर विवाद का अंतिम समाधान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों के अनुसार जनमत संग्रह (प्लेबिसाइट) के जरिए होना चाहिए। पाकिस्तान के मुताबिक, गिलगित-बाल्टिस्तान भी इसी विवादित क्षेत्र का हिस्सा है। इसी वजह से विशेषज्ञों का मानना है कि विधानसभा से प्रस्ताव पास होने के बावजूद गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का स्थायी पांचवां राज्य बनाना आसान नहीं होगा। ऐसा करने पर पाकिस्तान के उस पुराने रुख पर सवाल उठ सकते हैं, जिसमें वह कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताता रहा है। यही कारण है कि प्रस्ताव में केवल अस्थायी (प्रोविजनल) राज्य बनाने की बात कही गई है। गिलगित-बाल्टिस्तान को 2009 में पहली बार मिली विधानसभा 1947 से लेकर कई दशकों तक गिलगित-बाल्टिस्तान का प्रशासन सीधे पाकिस्तान की केंद्र सरकार के हाथ में रहा। यहां न तो प्रांत का दर्जा था और न ही लोगों को अपने प्रतिनिधियों के जरिए शासन चलाने का अधिकार मिला था। 2009 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान एम्पावरमेंट एंड सेल्फ-गवर्नेंस ऑर्डर लागू किया। इसके तहत पहली बार यहां विधानसभा चुनाव कराए गए और स्थानीय सरकार बनाई गई। हालांकि विधानसभा के अधिकार सीमित थे और बड़े फैसले केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री के हाथ में ही रहे। इसके बाद 2018 में गिलगित-बाल्टिस्तान ऑर्डर-2018 लागू किया गया, जिसके तहत स्थानीय विधानसभा और मुख्यमंत्री को पहले से ज्यादा अधिकार दिए गए। इसके बावजूद गिलगित-बाल्टिस्तान आज तक पाकिस्तान का संवैधानिक राज्य नहीं बन सका। गिलगित-बाल्टिस्तान और भारत का क्या संबंध है? गिलगित-बाल्टिस्तान ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में कश्मीर घाटी के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह कभी जम्मू-कश्मीर रियासत का हिस्सा था। उस समय रियासत पांच हिस्सों में बंटी थी- जम्मू, कश्मीर, लद्दाख, गिलगित वजाहत और गिलगित एजेंसी। आज पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर क्षेत्र का करीब 85% हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान (नॉर्दर्न एरियाज) में है, जबकि लगभग 15% हिस्सा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) कहलाता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भी इसी इलाके से होकर गुजरता है। पाकिस्तान की जीवनरेखा मानी जाने वाली सिंधु नदी भी सबसे पहले इसी क्षेत्र में प्रवेश करती है। गिलगित-बाल्टिस्तान भारत से अलग कैसे हुआ? पाकिस्तान ने इसे संविधान में क्यों शामिल नहीं किया? 2009 के बाद प्रशासनिक व्यवस्था कैसे बदली? साल 2000 के बाद, खासकर अमेरिका में 9/11 हमलों और चीन के वन बेल्ट वन रोड (अब बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) परियोजना में इस इलाके की बढ़ती रणनीतिक अहमियत को देखते हुए पाकिस्तान ने यहां प्रशासनिक बदलाव शुरू किए। 2009 के ऑर्डर के तहत नॉर्दर्न एरियाज लेजिस्लेटिव काउंसिल (NALC) की जगह गिलगित-बाल्टिस्तान लेजिस्लेटिव असेंबली बनाई गई और नॉर्दर्न एरियाज का नाम बदलकर गिलगित-बाल्टिस्तान कर दिया गया। हालांकि विधानसभा बनने के बाद भी अंतिम अधिकार इस्लामाबाद के पास ही रहे। नई विधानसभा में 24 सदस्य सीधे चुने जाते हैं और 9 सदस्य नामित किए जाते हैं। 2010 के बाद से हर चुनाव में इस्लामाबाद में सत्ता में रहने वाली पार्टी ही यहां सरकार बनाती रही है। नवंबर 2020 के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने 33 में से 24 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।

भारत के बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में देरी होने पर जापान के पूर्व न्याय मंत्री हिदेकी माकिहारा ने भारत पर ही गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया X पर लिखा कि देरी की सबसे बड़ी वजह भारतीय मंत्री का रवैया रहा। माकिहारा ने कहा- मैं खुद प्रोजेक्ट से जुड़ा रहा। जापानी टीम ने पूरी मेहनत की, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले। भारतीय पक्ष ने वादे पूरे नहीं किए, समझौतों से पीछे हट गए। अपने हिसाब से शर्तें बदलते रहे। इसी वजह से प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ा। माकीहारा ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर यह बात कही। पीएम नरेंद्र मोदी और जापानी के पूर्व PM शिंजो आबे ने 14 सितंबर 2017 में इस प्रोजेक्ट का इनॉगरेशन किया था। भारतीय विदेश मंत्रालय ने माकीहारा के बयान पर कहा- भारत और जापान के बीच बातचीत अच्छी तरह आगे बढ़ रही है। जापान की पीएम के दौरे का भी असर नहीं- माकिहारा माकिहारा के मुताबिक, जापान की प्रधानमंत्री के दौरे से भी कोई नतीजा नहीं निकला। प्रधानमंत्री साने ताकाइची 1-3 जुलाई 2026 में भारत दौरे पर आई थी। इस दौरान दोनों देशों ने 129 समझौतों का ऐलान किया था। इन समझौतों का मकसद निवेश, उद्योग, मैन्युफैक्चरिंग, तकनीक, कौशल विकास और सप्लाई चेन सहयोग को मजबूत करना है। माकिहारा ने पोस्ट में टॉयो केइजाई ऑनलाइन की रिपोर्ट भी शेयर की। इसमें दावा किया गया कि बुलेट ट्रेन के सबसे अहम सेफ्टी सिस्टम (सिग्नलिंग सिस्टम) में जापान को शामिल नहीं किया गया। माकीहारा ने कहा कि इस प्रोजेक्ट के आगे न बढ़ पाने की पूरी जिम्मेदारी 100% भारतीय पक्ष की है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा- मुंबई और अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना पर भारत और जापान के बीच बातचीत अच्छी तरह आगे बढ़ रही है। जापान की E-10 ट्रेन सीरीज अभी डेवलप की जा रही है और इसकी आपूर्ति 2030 के शुरुआती वर्षों में होगी। दोनों देशों ने फैसला किया है कि 2027 में शुरू होने वाले पहले सेक्शन पर भारतीय हाई स्पीड ट्रेन शुरू की जाएगी। भारत ने आरोप खारिज किए भारत सरकार ने मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर जापान के साथ मतभेद की खबरों को खारिज किया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि पूर्व जापानी मंत्री की टिप्पणी उनकी निजी राय है और उसका वास्तविक स्थिति से कोई मेल नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, "हमने संबंधित पोस्ट देखी है। यह एक व्यक्ति की निजी राय है, जो तथ्यों से काफी अलग है।" मंत्रालय ने कहा कि मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल परियोजना पर भारत और जापान के बीच बातचीत अच्छी तरह आगे बढ़ रही है और दोनों देश इस परियोजना पर मिलकर काम कर रहे हैं। 2017 में शुरू हुआ बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट देश की पहली बुलेट ट्रेन मुंबई से अहमदाबाद के बीच चलेगी। दोनों शहरों के बीच 508 किमी का सफर बुलेट ट्रेन तीन घंटे में तय करेगी। अभी सफर में सात-आठ घंटे लगते हैं। प्रोजेक्ट में ₹88 हजार करोड़ जापानी निवेश मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की अनुमानित लागत करीब ₹2 लाख करोड़ है। लगभग ₹88 हजार करोड़ जापान की सरकारी एजेंसी JICA देगी। भारत को इस पर सिर्फ 0.1% सालाना ब्याज लगेगा। इस कर्ज को चुकाने के लिए भारत को 50 साल मिलेंगे और पहले 15 साल तक किस्त नहीं देनी होगी। जापान अब तक 1,150 अरब येन (करीब ₹55 हजार करोड़) मंजूर कर चुका है। वह शिंकानसेन तकनीक, ट्रेनिंग और तकनीकी विशेषज्ञता भी भारत को दे रहा है। रूट का 7 किमी हिस्सा समुद्र के अंदर होगा --------------------- ये खबर भी पढ़ें… मोदी बोले- सुजुकी दो-तिहाई कारें भारत में बना रही:जापान की मदद से देश में खाद के 1000 कारखाने लगेंगे; PM ताकाइची को बहन कहा भारत और जापान ने आर्थिक साझेदारी को नई रफ्तार देने का फैसला किया है। भारत-जापान जॉइंट इकोनोमिक फोरम में प्रधानमंत्री मोदी ने जापानी कंपनियों की दिक्कतें दूर करने के लिए 'जापान बिजनेस वीक' शुरू करने का ऐलान किया। इसके तहत PMO के सीनियर अधिकारी सीधे जापानी निवेशकों से बातचीत करेंगे। पूरी खबर पढ़ें…


फीफा विश्व कप 2026 के सेमीफाइनल में इंग्लैंड को 2-1 से हराने के कुछ घंटों बाद अर्जेंटीना और ब्रिटेन के बीच फॉकलैंड द्वीप को लेकर नया विवाद शुरू हो गया। अर्जेंटीना ने आरोप लगाया कि ब्रिटेन की रॉयल नेवी का वॉरशिप HMS मेडवे बिना अनुमति उसके समुद्री क्षेत्र में घुस आया। अर्जेंटीना ने इसे सैन्य घुसपैठ करार दिया। विदेश मंत्री पाब्लो क्विर्नो ने कहा कि इस मामले में ब्रिटिश दूतावास के सामने औपचारिक विरोध दर्ज कराया गया है। वहीं ब्रिटेन ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि यात्रा की जानकारी पहले ही अर्जेंटीना सरकार को दे दी गई थी और यह अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप थी। यह विवाद उस समय और बढ़ गया जब इंग्लैंड को हराकर फाइनल में पहुंचने के बाद अर्जेंटीना के खिलाड़ियों ने मैदान पर ‘लास माल्विनास सन अर्जेंटीना’ (माल्विनास अर्जेंटीना का है) लिखा बैनर लहराया। अर्जेंटीना में फॉकलैंड को माल्विनास कहा जाता है। इस घटना के बाद दोनों देशों का पुराना विवाद फिर चर्चा में आ गया। अर्जेंटीना की उपराष्ट्रपति ने इंग्लैंड को समुद्री लुटेरा कहा मैच से पहले अर्जेंटीना की उपराष्ट्रपति विक्टोरिया वियारुएल ने इंग्लैंड को आक्रमणकारी और कब्जा करने वाले समुद्री लुटेरे तक कहा था। मैच जीतने के बाद उन्होंने खिलाड़ियों की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “फॉकलैंड अर्जेंटीना का है। हमें स्टेडियम में यह बैनर ले जाने से रोका गया, लेकिन वे भूल गए कि माल्विनास हमारे खून और हमारे दिल में बसता है।” ब्रिटेन ने नाराजगी जताई, कहा- खेल में राजनीति न हो वहीं, ब्रिटेन के बिजनेस सेक्रेटरी पीटर काइल ने खिलाड़ियों के बैनर को पूरी तरह अनुचित बताया। उन्होंने कहा कि फुटबॉल में राजनीति की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और फीफा को जांच करनी चाहिए कि कहीं खिलाड़ियों ने राजनीतिक संदेश देने संबंधी नियमों का उल्लंघन तो नहीं किया। उन्होंने कहा, “राजनीति को फुटबॉल से दूर रहना चाहिए। आगे क्या कार्रवाई होगी, इसका फैसला अब फीफा करेगा।” फॉकलैंड को लेकर अर्जेंटीना और ब्रिटेन में 44 साल से विवाद फॉकलैंड द्वीप का मामला ब्रिटेन और अर्जेंटीना दोनों के लिए बहुत बड़ा मुद्दा है। दोनों देश इस पर दावा करते हैं। अर्जेंटीना इस द्वीप को माल्विनास कहता है। फॉकलैंड दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित हैं और अर्जेंटीना से सिर्फ 500 किमी दूर है। वहीं ब्रिटेन से यह 13,000 किमी दूर स्थित है। अर्जेंटीना ऐतिहासिक रूप से इस द्वीप को अपना बताता आया है। अर्जेंटीना का कहना है कि ये द्वीप उसके पास होने चाहिए, क्योंकि ये उसके इलाके के करीब हैं। वहीं ब्रिटेन कहता है कि वहां रहने वाले लोग खुद को ब्रिटिश मानते हैं और उन्होंने वोट करके भी ब्रिटेन के साथ रहने की इच्छा जताई है, इसलिए यह उसका क्षेत्र है। 1982 में अर्जेंटीना ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था, जिसके बाद ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने सेना भेजकर सिर्फ 10 हफ्ते में इन्हें वापस हासिल किया था। अर्जेंटीना के आत्मसमर्पण करने से पहले लगभग 650 अर्जेंटीनाई सैनिक और 255 ब्रिटिश सैनिक मारे गए थे। फॉकलैंड पर ब्रिटेन का रुख क्या है ब्रिटेन ने दोहराया कि फॉकलैंड द्वीप के लोगों ने कई बार जनमत के जरिए ब्रिटिश क्षेत्र बने रहने की इच्छा जताई है। डाउनिंग स्ट्रीट ने कहा- ब्रिटेन का रुख बिल्कुल स्पष्ट है। फॉकलैंड द्वीप के लोग ब्रिटिश हैं और अपने भविष्य का फैसला करने का अधिकार उन्हीं के पास है।